Monday, December 21, 2009

काश !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

16-7-08
काश में एक परिंदा होती,इतनी आजाद की बिन सीमाओंकी उड़ान भारती ,
काश में नदिया होती इतनी पावन की मेरी सिसकिया भी लहरें कहलाती ।
काश में बारिश होती इतनी निर्मल की मोती ना बनती तो ना सही मिटटी में मिल जाती ,
काश में चांदनी रात होती इतनी शीतल की सुबह होते ही ढल जाती ,
काश में पानी का बुलबुला होती इतनी कोमल की छुते ही उसमे घुल जाती ,
काश में-में न होती चाहे फिर में गुलाब होती इतनी पवित्र की मुरझाने के बाद भी मेरी महक हर जगह को महकती ,
काश में एक लम्हा बनजाती न चाहकर भी सबको याद आती,
काश में-में न होती काश ,काश .................

1 comment:

  1. waah...Kash ye sab sach ho jaaye :) ..beautiful poem ...keep on writing ..All the best !!!

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