जब में अकेली चलती हु राहो में क्यों कोई हाथ मुझे थामकर आगे नही बदाता ,
क्यों जब में दुन्द्ती हु कोई सहारा तो हर कोई मुझे तनहा हे छोड़ जाता,
जब ये दिल माननेलगता हे किसीको अपना तो वो इस दिल को हे तोड़ जाता ,
क्यों जब हम किसी क करीब हो जाते हे तो वो हमसेइतनी दूर हे चला जाता हे,
आदत तो हे इन गुमो को सरहाने की मगर फिर भी हरबार ये दर्द नया सा लगता हे,
क्यों हर कोई अपना बनकर कभी कोई रिश्ता ही नही निभाता.......
No comments:
Post a Comment