क्या जानू कौन हु मैं?
किस माला की डोर हु मैं?
अपनों के बिच में गैर सी लगती हु ,बारिश में भी पतझड़ सी लगती हु ,
हर सुबह में रात का अँधेरा देखती हु ,भरी किताब में एक कोरा कागज़ हु मैं,
चलती साँसों में मौत का एहसास सी लगती हु,बेरंग हे दुनिया मेरी बेजुबा हे हर लफ्ज़ मेरा,
दिल से धड़कने गूम सी गयी हे, नहीं जानती हु कौन हु मैं?
किस पहली का जवाब हु मैं,किस रात का ख्वाब हु मैं, क्या जानू कौन हु मैं?
हर ख़ुशी में दर्द सी लगती हु,सबकी आँखों में अश्क सी लगती हु,
अमृत में भी ज़हर सी लगती हु,हारे हुए किसी खेल सी लगती हु,
में कुछ भी नहीं बस मिटटी के एक ढेर सी लगती हु,क्या जानू कौन हु मैं?
क्वाबो में टुटा अकेला ख्वाब हु मैं,नहीं कोई सहारा मेरा एक दरिया शोर हु मैं,
ना कोई उम्मीद हे मुझसे , ना कोई विश्वास हे मुझपे,
टुटा हर विश्वास हु मैं,बिखरा कोई जज़्बात हु मैं,
हर ज़ख़्म हे मुझसे ही शायद ,कट गए हे पंख मेरे तिनका- तिनका भिखर सी गयी हु मैं,
बचा नहीं कुछ मेरे पास अब ,नहीं जानती कौन हु मैं....?
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was searching for the best line in this...but couldnt find...as the whole poem is amazing :) ..Keep it up n All the best !!!
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